धर्म क्या है ?

धर्म क्या है ?

धर्म क्या है ( what is religion ) समझने के लिए, सबसे पहले मैं पूछना चाहूँगा :
गीता क्या है ?
कुरान क्या है ?
बाइबिल क्या है ?

क्या हिन्दू का धर्म गीता से भिन्न है ?
क्या मुसलमान का धर्म कुरान से अलग है ?
और क्या इसाई का धर्म बाइबिल से अलग है ?

गर नहीं , तो फिर ये सब क्या है ?

गीता ज्ञान हैं , कुरान ज्ञान हैं और बाइबिल भी ज्ञान हैं।

गर ये ग्रन्थ-ज्ञान है, तो फिर धर्म क्या हैं ?
धर्म भी ज्ञान ही हैं , हम इनके साथ जन्म नहीं लेते अपितु हम इन्हे सीखते है,
(we are not inherited with religion, we learn it)।

अब जो लोग ये कहते है,जिस घर में हमारा जन्म हुआ, भगवान ने हमें वही धर्म दिए,
गर ये बात सच है, तो फिर आप मनुष्य का धर्म परिवर्तन क्यूँ करना चाहते ?

वस्तुतः दोनों बातो में से कोई तो गलत हैं।

ना तो राम हिन्दू थें, ना ही कृष्ण हिन्दू,
और ना ही प्रभु यीशु ईसाई थें,
ना ही बुद्ध बौद्ध थें, ना महावीर जाएं थें।

वस्तुतः वे सब महान थें, वे किसी एक ( धर्म ) या व्यक्ति के हो ही नहीं सकते थें,
कल्पना करो राम के युग का, जब वो छोटी सी जगह में रहते थें (आज का उत्तर प्रदेश),
उस वक़्त वो सबके हुए, जिसने भी उन्हें प्रेम से अपनाया उनके हो गए,
याद करो शबरी के झूठें बेरो को खाते हुए, विभीषण ( राछस ) को अपना मित्र समझते हुए,
तो क्या वो किसी मुस्लमान या ईसाई को नहीं अपनाते ?
जरूर अपनाते, जैसे विभीषण को अपनाया।

उनके लिए धर्म क्या था ? क्या वो हिन्दू थें ? नहीं। उस वक़्त हिन्दू नाम का कोई शब्द ही नहीं रहा होगा,
उनके लिए धर्म था : पत्नी का सम्मान करना, पिता की आज्ञा मन्ना, गुरुओ की सेवा करना, सबसे स्नेह भाव रखना।
सीता के लिए धर्म क्या था ? पति का सम्मान करना, पतिव्रत होना, पति का हर हाल में साथ देना उनका धर्म था।
लक्ष्मण के लिए धर्म था , अपने बड़े भइया की सम्मान करना, उनका रक्षा करना।
उनमें से किसी ने कभी नहीं कहा में हिन्दू धर्म का हूँ।

तो आप किस हिन्दू धर्म की बात कहते है ? आप खुद को हिन्दू धर्म के बताते हो पर पति या पत्नी का सम्मान नहीं करते,
आप खुद को हिन्दू धर्म का बताते पर अपने ही भाई के साथ जमीन जायदात के लिए लड़ते झगड़ते, क्या आप धार्मिक हो ? नहीं।

अब बात करते हैं, ईसाई की, क्या प्रभु यीशु ईसाई थे ?
आप कहते हो, “He was a son of God, who was sent to us, to take our sins”,
गर वो son of God थे, तो क्या परमात्मा ने उन्हें सिर्फ एक कौम के लिए भेजा था इस धरती पे ?
या फिर समस्त मानव जात के लिए भेजा होगा ?

की तुम जाओ और दुनिया को प्रेम का सन्देश दे आओं,
गर यीशु son of God थे ? तो क्या वो मेरे लिए भी son of God नहीं थें ?
बिलकुल थें, वो तो सबके लिए भेजे गए इस जहां में।
कल्पना करो ईशु के समय को, जब वैष्वीकरण ( globalization ) नहीं हुआ था,
और वो जिस गांव में रहते थें वहां के समस्त लोगो को प्रेम और शांति की बात समझाते थें,

गर यीशु आज के इस युग में होते तो, फिर तो वह पूरी दुनिआ में भ्रमण करता
और सबको अपनाता और प्रेम और शांति की बाते कहता।
तो फिर आपको किसने यह हक़ दिया की आप ऐसे महान व्यक्तिव्त की copy right करे ?
की वो सिर्फ ईसाई धर्म के थें ? ईशु सबके है।

अब बात करते है इस्लाम की :
यह बड़ी विचित्र बात है कि,
इस्लाम कहता है,” ये कायनात अल्लाह ताला ने बनाया,
और वो अपने अल्लाह के लिए जिहाद करेंगे, और कश्मीर को पाकिस्तान से मिला देंगे। “

मेरे इस्लाम भाई बहन कितने नादान है, इक तरफ ये कहता है, ये कायनात अल्लाह ने बनायीं हैं,
गर ये कयनाथ अल्लाह ने बनायीं है, तो क्या उसने हिन्दुओ या इसईओ को नहीं बनायीं ?
क्या वह हिंदुस्तान नहीं बनायीं ? क्या अमेरिका नहीं बनाया ?
गर ये कयनाथ उसने बनायीं तो उसने मुझे भी बनाया , मतलब मैं भी उसका, तुम भी उसके, बाकी सब भी उसकी ,
हिंदुस्तान भी उसका , पाकिस्तान भी उसकी , अमेरिका भी उसकी , सबकुछ उसी की है।

गर ये कयनाथ उसने बनायीं तो क्या सिर्फ वह पाकिस्तान और कश्मीर जैसे छोटी सी जगह में रहता होगा ?
या फिर पूरे कयनाथ में मौज़ूद है ? मतलब हिंदुस्तान के जर्रे जर्रे में वह मौजूद है।
और तुम कहते हो तुम जिहाद करोगे अपने अल्लाह के लिए, और कश्मीर को पाकिस्तान से मिलाओगे ?

जानते ही क्या हो तुम अपने खुदा के बारे में ?
खुदा है खुद में , खुद के भीतर तलाशो उन्हें,
शायद किसी दिन तुम्हे वह मिल जाये।

तो इक बार फिर वापस आता हु, धर्म क्या है ? धर्म का अर्थ ज्ञान है, और गर ये ज्ञान है तो सभी को सारे ज्ञान मिलनी चाहिए ,
तो इन किताबो को मंदिर, मस्ज़िद या चर्च में नहीं बल्कि पुस्तकालय में रखनी चाहिए थीं,
जिससे, जिसका मन होता पड़ सकता और ज्ञान अर्जित करता,
पर धर्म के ठेकेदारों ने इन्हे मंदिर मस्जिद में रखकर अपने पास रक्खे ज्ञान को लोगो तक सार्वजनिक नहीं किये,
आपको एक किताब पड़ने के लिए, उस धर्म को अपनाना पड़ेगा, यह गलत है।

और फिर अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना गलत है,
ज्ञान अनमोल है, उसका कोई मोल नहीं लगा सकता।
सभी से ज्ञान अर्जित करे, न की एक ही धर्म के ज्ञान तक सीमित रह जाए।
पर शायद ये बात उन धर्म के ठेकेदारों को भी नहीं पता होगा और सब एक होड़ लगाए हुए है की किसका धर्म श्रेष्ठ है।

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